गुरुदेव ने बदल दी जीवन की दिशा-दशा


गुरुदेव ने बदल दी जीवन की दिशा-दशा


         मैं डॉ. विजय कुमार कौशल व पत्नी डॉ. रजनी, दोनों चिकित्सक हैं। पर पहले ऐसा नहीं था हम लोग किसी प्रकार अपना जीवन यापन कर रहे थे। 
         जीवन में कभी कोई ऐसा भी मिल जाएगा जिससे मेरे जीवन की दिशा और दशा ही बदल जाएगी, ऐसा मैंने कभी सोचा न था।
         बात आज से लगभग सात वर्ष पहले की है किसी ने मुझे बाबा नीब करौरी महाराज के बारे में बताया, अद्भुत, अकल्पनीय, अनुपम बातें सुनकर मुझे अनायास ही ऐसा लगा जैसे जन्मों का कोई बिछुड़ा मिल गया हो।
         उन्होंने मुझे कैंची धाम और वहाँ होने वाले वार्षिकोत्सव के बारे में बताया और ये भी बताया कि वहाँ 15 जून को पहाड़ पर दो लाख से अधिक लोग इकट्ठे होते हैं। मुझे पता लगा कि बाबा जी अपनी इस नश्वर देह का त्याग कर चुके हैं पर वह अजर अमर हैं और सदैव इस धरा पर निवास करते हैं।



         बाबा जी के दर्शनों की ललक मेरे मन में उत्पन्न हो चुकी थी और देखते ही देखते वर्ष का जून माह आ गया। मैंने अपने एक मित्र से कैंची धाम जाने की इच्छा प्रकट की, मेरा मित्र तुरंत राजी हो गया। बस यहीं से मेरे जीवन में चमत्कारों का सिलसिला शुरु हो गया और अनवरत रूप से चालू है।
         जिस दिन मैं प्रथम बार बाबा जी के धाम को जाने के लिए घर से निकला, अचानक ही मेरे मन में राम चरित मानस की एक चौपाई - मंगल मूरति मारुति नंदन, सकल अमंगल मूल निकंदन । गूंजने लगी।
 इस चौपाई को पहले कभी पढ़ा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पर आज यह चौपाई बार बार मेरे मन में गूँज रही थी।
         मैं सत्य कहता हूँ 550 कि. मी. की यात्रा के बाद जब मैंने कैंची मंदिर में पहला कदम रखा तो मंदिर के अंदर से मेरे कानों में पड़ने वाली पहली ध्वनि यही चौपाई थी। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।
         बाबा के दिव्य दर्शन हुए, बाबा ने मुझे प्रेम से स्वीकार किया और मैंने भी बाबा को अपनी आत्मा में बसा लिया। उस दिन से मैं मन ही मन बाबा जी से बातें करता और बाबा जी भी मुझसे खूब बात करते। उन्होंने मुझे इस जीवन का रहस्य समझाया।
         मैं बाबा जी का दास हो गया। एक बार मैंने बाबा जी को बताया कि युवावस्था में, मैं डॉक्टर बनना चाहता था, परीक्षा भी दी पर सफल ना हो सका। 
         बाबा जी ने कहा- तो अब बन जा डॉक्टर.... बस फिर क्या था.... रास्ते खुलते गए और सपत्नीक आज मैं चिकित्सक हूँ। जय हो बाबा नीब करौरी महाराज जी की। 


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डा. विजय कुमार कौशल
भरथना, इटावा, उ.प्र.