भक्तिधाम-आध्यात्मिक पावन स्थली


भक्तिधाम-आध्यात्मिक पावन स्थली



      आज के कोलाहल, ईर्ष्या, द्वेष एवं स्पर्धा भरे माहौल में मानव का अन्तर्मन कहीं प्र्रेम और शान्ति की खोज में स्वयं ही गुमराह सा हो गया है। निराश मनुष्य का अन्तर्मन खामोश तो है; पर शांत नहीं। आज आवश्यकता है कि मन की समस्त सकारात्मक ऊर्जा को सही रूप से एकत्र कर जीवन को ऊर्जान्वित करने की।
      'मौन साधना' भक्ति मां का दिया हुआ वह जीवंत संदेश है, जो कि मनष्य को समस्त अनचाहे अन्तर्द्वंद्वों से दूर कर अन्तर्मन को ऊर्जान्वित कर देता है। कुमांऊ की मौन साधिका भक्ति माँ ने अपने जीवन के 60 वर्षों तक मौन साधना के द्वार जीवन ज्योति को आध्यामिकता की प्रखरता से ऊर्जावान कर दिया।



      नौकुचिंयाताल स्थित भक्तिधाम में भक्ति माँ के स्नेहसिक्त आशीर्वाद से सदैव ही शांति की परम चेतना का निर्झर झरना बहता ही रहता है।
      कुमांऊ की पावन धरती पर बसा नौकुचियाताल, नैनीताल शहर से 27 किमी. की दूरी पर स्थित है। प्राकृतिक सुन्दरता से ओतप्रोत, पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में मानो प्रकृति ने प्रदूषणरहित इस धरा को आध्यात्मिक ज्ञान केन्द्र के विशेष रूप से चुना है। नौकुचियाताल का शाब्दिक अर्थ है, ऐसा ताल जिसके नौ कोने है। 
      नौकुचियाताल आज भक्ति मां के द्वारा बसाया गया ऐसा आध्यात्मिक केन्द्र बिन्दु बन गया है, जब शांति एवं एकाग्रता का पूर्ण समावेश है। दूर-दूर से भक्तजन इस पावन स्थली पर शहर के कोलाहल से दूर अपने मन को पावन अमृततुल्य आध्यात्मिक ज्ञान एवं शान्ति से सिंचित कर आनंदित हो उठते है।
 एक बार भक्ति माँ से किसी भक्त ने यूं ही प्रश्न किया कि उन्हें इस पावन धरती पर इतने विशाल मंदिर परिसर बनाने की प्रेरणा कैसे मिली? माँ ने मुस्कुरा कर अपनी स्लेट पर लिख कर व्यक्त किया कि, यह तो ईश्वर का प्रावधान था। मैं तो बस निमित्त मात्र थी।



      सचमुच! ऐसी प्रबल इच्छा शक्ति धन्य है। मां स्वयं मानती है कि प्रबल इच्छा शक्ति के संचार मात्र से ही; ईश्वर स्वयं पूर्ण रूप से अपने कार्य स्वयं करवाने की जिम्मेदारी ले लेता है। ऐसे बहुत से चमत्कारों की श्रृंखला को मां स्वयं अपने जीवन में ईश्वरीय प्रेरणा का स्रोत मानती है। 
      एक बार मां ने मन में विचार किया कि भक्तिधाम परिसर में 11 फीट की हनुमान जी मूर्ति का निर्माण करवाऊं। इच्छा शक्ति तो दृढ़ थी, परन्तु साधन सीमित। फिर भी प्रभु प्रेम की प्रेरणा चरम सीमा पर भक्त जन जुड़ते चले गये और देखते ही देखते सर्वसहयोग से 52 फीट की विशालकाय हनुमान जी की मूर्ति का निर्माण सफल रूप सम्पन्न हो गया।
      ऐसे ही एक बार भक्ति मां ने वृंदावन में 108 भागवत के आयोजन की प्रबल इच्छा को व्यक्त किया। भक्तजन शंका में थे कि सिर्फ इच्छा भर से यह संभव नहीं हो सकता मां के पास भी सिर्फ दृढ़ इच्छा शक्ति और 5000 रूपय के सिवा कुछ न था। सिर्फ इतने धन में सारे कार्यक्रमों को क्रमवार तरीके सम्पन्न करवाना जैसे असंभव सा ही था। फिर भी 'माँ' तो इतनी दृढ़ इच्छा शक्ति पर अड़िग थी। और परम सहारा ईश्वर पर पूर्ण विश्वास धीरे-धीरे भक्त जन जुड़ते चले गये। प्रेम स्वरूप दी गई धन राशि से धीरे-धीरे मानों कार्यक्रम की श्रृंखला अद्भुत तरीके से सुदृढ़ एवं व्यवस्थित होती चली गयी। ईश्वर के प्रति दृढ़ इच्छा शक्ति एवं कार्यक्रम के सफलतम संचालन की अदृश्य शक्ति को देखकर वे सभी भक्तजन भी आश्चर्यचकित रह गये जो आरम्भ में इसे असंभव सा मान रहे थे।
      माँ अपने शब्दों में अत्यन्त गूढ भावों को सरल शब्दां व्यक्त करते हुए कहती हैं कि जो कुछ भी होता है, वह ईश्वरीय अनुकम्पा है, सुख और दुःख का भोग अपने ही प्रारब्ध की फसल है, जो स्वयं को कर्म के अनुरूप काटनी पड़ती है। हमें सुख दुःख माया मोह से के बंधन से दूर कर ईश्वरीय भक्ति का सच्चा सुख प्रदान करने में सक्षम होता है। 
      'भक्ति धाम' की स्थापना की कथा भी रोचक है। सन् 1978 में भक्ति माँ ने 'शत् चण्ड़ी यज्ञ के आयोजन का प्रावधान भीमताल में रखा। परन्तु अर्थव्यवस्था सुदृढ़ न होने से कार्यक्रम का आयोजन असंभव सा प्रतीत हो रहा था। परन्तु दैवीय कृपा से भक्तजन जुड़ते चले गये एवं धनराशि एकत्र होती गई। तब मां का निवास स्थान भीमेश्वर मंदिर में था।
      एक दिन ध्यानमग्न माँ ने भक्त समूह के मध्य से श्री अम्बा दत्त जी को बुलाकर पूछा कि वे 'शत चण्ड़ी यज्ञ' से अपना योगदान देंगे? उनकी सकारात्मक अभिव्यक्ति के बाद मां ने उन्हें आदेश दिया कि वे पांच पंडितों के खर्च का वहन ग्रहण करें। इसी प्रकार मां के आदेशानुसार अन्य भक्तजन भी शक्ति एवं सामर्थ्यानुसार विभिन्न जिम्मेदारियों के वहन के लिए व्यक्तिगत रूप से दृढ़ रूप में एकत्र हो गये। श्री तिवारी पहली बार मुख्य पंडित की भूमिका में पहली बार एकि़त्रत जन सैलाब को देखकर अद्भुत रूप से आश्चर्यचकित रह गये।
      इसी प्रकार होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के मध्य भक्तजनों से इच्छा व्यक्त की कि धार्मिक कार्यक्रमों के लिए एक आश्रम की व्यवस्था होनी चाहिए। भक्तों एवं सेवकों के बीच लम्बें व्यक्तव्य एवं सुझावों के परिणाम स्वरूप हरि दत्त जोशी ने 'नाला धारा' की जमीन मां को दान स्वरूप प्रदान कर दी। और मां की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं भक्तों की प्रेरणा से भक्ति धाम का निर्माण प्रारम्भ हो गया।
      धीरे-धीरे यही भक्ति धाम माँ की कृपा एवं आशीर्वाद से आध्यात्मिक केन्द्र बन कर जनसमूह के लिये परम ज्ञान एवं शान्ति का स्रोत बन गया है। ईश्वरीय प्रेम से प्रेरणा पाकर भक्तजनों ने अपनी अमूल्य भेंट मां के चरणों में रखकर, भक्ति धाम के निर्माण एवं विकास में अमूल्य सहयोग दिया।
      माँ के आशीर्वाद एवं भक्तों के सहयोग से भक्ति परिसर में 52 फीट की विशालकाय श्री हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना का कार्य भी सम्पन हुआ। हनुमान जी की विशालकाय मूर्ति के समीप ही एक वैष्णोदेवी गुफा का निर्माण किया गया है। जिसके आरम्भ में श्री भैरों देव की मूर्ति, गुफा के मध्य वाटिका में कमल के फूलों का सरोवर एवं पुनः गुफा के अन्दर श्री वैष्णो देवी की तीन पावन मूर्तियों के दर्शन होते हैं। 
      मंदिर परिसर के मध्य में  बाबा नीब करोरी मंदिर के पावन दर्शन होते है। मोहक मुस्कान लिये बाबा की मूर्ति मानों आंखों से ही भक्तजनों के मन की पूरी बात जान लेती है। यहां पर दिन रात प्रकाशित होने वाला दीया मानों तन के अंधकार को प्रकाश में परिवर्तित कर देता है। मंदिर परिसर में ही सीताराम मंदिर, राधाकृष्ण जी की मूर्तियां की स्थापना भी की गई है। जहां पर सदैव मन भावन भजनों से रसमय संगीतमय वातावरण गुंजायमान रहता है। मंदिर के समीप ही विशाल प्रार्थना सभागृह है। जिसके समीप ही ध्यान केन्द्र है, जहां पर भक्तजन मन, तन की एकाग्रता कर योग साधना का ज्ञान प्राप्त करते हैं।
      कुछ वर्ष पूर्व ही मंदिर परिसर में नवग्रह मंदिर की स्थापना की गई है। जहां पर भारी मात्रा में श्रद्धालु आते हैं; तथा अपने श्रद्धा भक्ति एवं दर्शन के माध्यम से जीवन में सुख एवं शान्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते है।
      श्री भक्ति मां का जीवन ही स्वयं में उदाहरण हैं समर्पित प्रेम का अपने पावन भक्ति रस के रसास्वादन में उन्होनें आध्यात्म की पराकाष्ठा को स्पर्श किया था। और वे चाहती थी कि ईश्वर प्राप्ति, परम सुख एवं शान्ति के मार्ग हेतु अधिक से अधिक लोगों को ईश्वर की सरल एवं गूढ़ महिमा का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। प्रभु की महिमा को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाने के प्रयास में समय समय पर मां के द्वारा भागवत रसमय लीला का आयोजन होता रहा। उनका यह दृढ़ विश्वास था इस तरह लोगों के आध्यात्मिक विकास की श्रृंखला में परस्पर प्रेम और सौहार्द की भावना पल्लवित होने से समाज में सकारात्कता का विकास होता रहेगा। 
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डा0 कुसुम शर्मा, नैनीताल