दर्द भुलाकर ऊर्जान्वित कर दिया

ल्द्वानी में आरटीओ रोड़ के निकट स्थित बेटी के आवास में सुन्दरकाण्ड के आयोजन की तैयारियाँ हो रही थी। मैं भी पति के साथ कुछ दिनों के लिए बेटी और दामाद के आग्रह पर हल्द्वानी उनके आवास पर रहने आई थी। पर बढ़ती उम्र के साथ अब शारीरिक परेशानियों से दिनचर्या की रफ्तार ढलने सी लगी थी। घुटनों और हड्डियों के दर्द से सीढ़ियों पर चढ़ना-उतरना मुश्किल लगने लगा था। सुन्दरकाण्ड़ का आयोजन तीसरी मंजिल के हॉल में होना निश्चित हुआ था। जिसमें बेटी और दामाद ने बड़े निष्ठा और प्रेम से गुरूदेव महाराज की तस्वीर के साथ महाराजजी के कक्ष का निर्माण करवाया था। पवित्र धूनी, शयन स्थल, देवी देवताओं की मूर्ति एवं चित्रों के साथ, पवित्रतता से पूजा पाठ की तैयारी चल रही थी। मेरे पति जो कि आध्यात्मिक रूप में ईश्वर से जुडे़ हैं। पहले ही मंदिर में आसन लगा कर ध्यान में बैठ गये। मेहमान, भक्तों का आगमन भी होने लगा। सभी सीढ़ियां चढ़कर ऊपरी मंजिल तक पहुंचने लगे। मैं दूसरी मंजिल के पोर्च पर कुर्सी पर बैठी यह विचार करने लगी कि अब कैसे इतनी सीढ़ियां चढ़कर ऊपर हॉल तक पहुचूंगी? और किसी तरह पहुंच भी गई तो इतनी देर तक बैठना मेरे लिये संभव भी हो सकेगा क्या? घुटनों के दर्द से उठना भी मुश्किल हो रहा था। मन हो रहा था दवाइयां खाकर चुपचाप लेट जाऊं, किसी को पूजा के मध्य अपनी वजह से परेशान करना ठीक नहीं रहेगा। पर मन तो सुन्दरकाण्ड़ की चौपाइयों के संगीतमय लहरियों के लिए तड़प रहा था। इस अन्तर्द्वद्व, में उलझी थी। अब क्या करूं? कैसे जाऊं? कैसे पूरी पूजा होने तक आराम से बैठ पाऊंगी? सिर झुका कर अपने ही विचारों में उलझी थी। तभी मैंने अपने पास कम्बल में लिपटी एक वृद्ध हृष्ट पुष्ट आकृति को महसूस किया। कुर्सी के पास ही झुक कर उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर देखा। मैं उनकी तरफ देखकर संज्ञा शून्य सी हो गई। श्री नीम करौली महाराजजी? वही विशालकाय शरीर...दाढ़ी कुछ सफेद काली सी, आंखों में असीम अमृततुल्य प्रेम, उन्होंने पूछा क्या हुआ? तबियत ठीक नहीं है? मेरे शब्द जैसे अन्तर्मन में ही विलीन हो गये। मैं उनकी मासूम सी मुस्कुराहट के बीच उनके होठों और मुख में साइड के दांतो को देख रही थी। कैसी दिव्य मुस्कुराहट थी। आंखों में कितना असीम पितातुल्य प्रेम था?
 जब तक मैं कुछ समझ पाती, सब कुछ अदृश्य हो गया। अब तक मैं अपने सिर पर महाराजजी का वरदहस्त महसूस कर रही थी। इधर-उधर देखा कोई भी नहीं था। मैं स्वप्न में हूँ या जागृत अवस्था में? वहीं दिव्य शब्द गूंज रहे थे। मैंने शरीर के भारीपन और दर्द में कुछ हल्कापन सा महसूस किया। उठने की कोशिश की तो आराम से कुर्सी से उठ गई। फिर सहारा लेकर सीढ़ी चढ़ने की कोशिश की तो महसूस किया जैसे मैं हल्की सी होकर बड़े आराम से चल सकती हूँ। मन में गज़ब का उत्साह और शरीर में नई स्फूर्ति का संचार हो गया था। मैं हॉल में आकर आराम से सुन्दरकाण्ड लेकर बैठ गई। बेटी मुझे आश्चर्य से देखकर बोली, अरे मां बस मैं तुम्हें लाने वाली थी, जरा व्यस्त हो गई। अब दर्द कैसा है? मैं अन्तर्मन की दिव्य अनुभूति का प्रसाद पाकर ऊर्जान्वित हो रही थी। इशारे से ही कहा ठीक हूँ निश्चिंत रहो।
 सुन्दरकाण्ड का पाठ भजन कीर्तन के साथ सम्पूर्ण हो गया। श्री हनुमान चालीसा का पाठ भी हुआ। मैं शुरू से अंत तक लगातार मुग्ध स्वर में गाती रही। तन्मयता से प्रभु के साथ ही स्वयं का महसूस कर रही थी। बीच में बेटी, दामाद बच्चे पूछते रहे, पर मुझे प्रभु की कृपा से परम आनंद में अपने शारीरिक कष्ट का जरा भी आभास नहीं था। प्रभु ने स्वयं ही दर्द का निवारण कर मुझे इतना ऊर्जान्वित कर दिया था कि मेरा रोम रोम प्रभु को समर्पित भाव से कृतज्ञता व्यक्त कर रहा था। 
 लगभग तीन घंटे बाद प्रसाद वितरण के मध्य बेटी ने आकर आश्चर्य से मेरे इस तरह पूजा में लगातार बैठने पर चिंता व्यक्त की कि मुझे परेशानी तो नही हुई। जब मैंने अपना अनुभव व्यक्त किया तो उपस्थित जनसमूह भी आश्चर्यचकित हो उठा।
 मैं आज भी इस घटना को याद करती हूँ तो महाराजजी की वह दिव्य, मोहक मुस्कुराहट मेरा मन मोह लेती है। उम्र है शारिरिक कष्ट तो जीवन का हिस्सा है पर फिर भी तुलनात्मक रूप से मैं बेहतर महसूस करती हूँ और आध्यात्मिक रूप में स्वयं को महाराजजी के चरणों में समर्पित। धन्य हैं प्रभु जो अपने भक्त के हृदय की व्यथा को बिना व्यक्त किये ही स्वयं समझ लेते हैं और परम आनंद देकर सब कष्ट हर लेते है। 


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श्रीमती पुष्पा भण्डारी
अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड